हुए हम मरहूम जब से किस्मत को कोसने लगे जो दर्द दिया तूने सह कर दूर तुमसे होने लगे
राह ए तलब चल के कांटों पे मिलना तुमसे आसान नहीं अब होकर मजबूर अरमां खोने लगे
सितम ये कि बिछड़ने का शौक हम भूलने लगे और बढ़ा के फासला मुझसे तुम दूर होने लगे
मैं तरस गया तुम्हें देखने वास्ते और तुम भी अपनी आदत के मुताबिक जख्म और देने लगे
मिटा कर यादें तेरी मैं ही न पा सकूंगा चैन कभी और तुम भी कुछ सोच के दर्द और देने लगे
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