करके तकरार तुमसे फिर भी गद्दार मैं हो सकता नहीं सच तो ये होकर वफादार कभी मैं गुनहगार हो सकता नहीं
होकर मजबूर नसीब से दिल हमें तेरी खताओं से लगाना पड़ेगा बढ़ा के जुनून ए शौक अरमां मैं मिटा सकता नहीं
अच्छा है ऐ दोस्त बढ़ा के दर्द ख्वाब कुछ और हमें तू अब दे जा होकर खफा तुमसे फिर भी दर्द बढ़ा सकता नहीं
तू ना हो सका मेरा तो करूं क्या दर्द समेटना पड़ा चल के कांटों की राह पर अब चिराग ए दिल जला सकता नहीं
सच ये भी जुनून ए शौक मरता कहां कभी बढ़ा कर बेचैन तमन्ना अपनी ही दर्द ये चिराग़ ए दिल बुझा सकता नहीं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X