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सामाजिक विसंगति और जीवन का यथार्थ

                
                                                         
                            बड़ा आसान है बातें बनाना,
                                                                 
                            
शतरंज के नाकाम हुए मोहरे पर।
अच्छा कर लेते हैं विश्लेषण,
हम हारे हुए लाचार जुआरी पर!

ख़ुद कुछ किया नहीं जीवन में,
वे ही बजाते हैं भीड़ में तालियाँ।
बहाया जिसने पसीना संघर्ष में,
समाज से मिलती उनको गालियाँ!

दौलत पा ली ज़माने भर की,
सुकून न मिला ऊंचे महलों में,
तख़्त-ओ-ताज के अंधे नशे में,
फ़ौज बन गई अब दुश्मनों की!

रहा न कोई अब राज़दार,
घुटने लगा दम ख़ुद के आशियाने में।
बेचकर वो तमाम शोहरत भी,
मिटा न पाया आत्मा की तड़प को!

 
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17 घंटे पहले

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