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जय शंकर प्रसाद

                
                                                         
                            सुमधुर, सरस, सरल है जिनकी लेखनी
                                                                 
                            
नमन करती उर्वशी और ध्रुवस्वामिनी,
प्रसाद तो हैं हिंदी साहित्य के प्रासाद,
तितली और इरावती करती हैं संवाद,
चन्द्रगुप्त, समुद्रगुप्त तो हैं अजय,
अजातशत्रु क़ो मिली है सदा विजय
कामायनी सा है अदभुत भावसौंदर्य,
अशोक की वीरता में है अदभुत शौर्य,
ममता और मधुलिका हैं कथा की अलंकार
प्रेम के त्याग में देशभक्ति का. है पुरस्कार,
छायावाद में छिपी है आकाशदीप की छाया,
कंकाल से ही बना दी है इंद्रजाल की माया,
जय शंकर जी का साहित्य जैसे धूप में हो छाया |
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एक दिन पहले

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