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जिंदगी मेरे दर को खटखटाती क्यों है

                
                                                         
                            जिंदगी मेरे दर को खटखटाती क्यों है,
                                                                 
                            
मेरी आँखों में ख़्वाब जगाती क्यों है।
रात हिस्सा है, उम्र का ,जी लेने दे,
जिंदगी छोड़ के तन्हा जाती क्यों है।

लोग तो बंजारों की तरह जी लेते हैं,
सड़कों में भी जिंदगी बसर कर लेते हैं।
मुझे ही घर बनाने को उकसाती क्यों है,
जिंदगी मेरे दर को खटखटाती क्यों है।

भूल चुके थे जिन रंगों को हम
फिर से उन्ही रंगों से मिलाती क्यों है
मेरी जिंदगी में चमकीले रंग भरकर
जिंदगी इंद्रधनुषी बन जाती क्यों है

जिंदगी मेरे घर में रोशनदान बनाती क्यों है
आखिर मुझे रोशनी से मिलाती क्यों है
मेरी आँखों में नए ख्वाब जगाती क्यों है
जिंदगी मेरे दर को खटखटाती क्यों है
-राजेश्वरी जोशी
 
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एक घंटा पहले

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