तबस्सुम इस लिये लब पर कि दिल शादाँ नहीं होता,
वर्ना हमसे हाल-ए-दिल कुछ भी बयाँ नहीं होता।
रंज-ओ-ग़म की धूप में भी सर उठाए फिरते हैं,
यूँ ही हर इक शख़्स से अपना फ़साना नहीं होता।
हज़ारों ज़ख़्म सीने में लिये हम जी रहे हैं यूँ,
कि जैसे इश्क़ बिन इंसाँ कभी इन्साँ नहीं होता।
हवाएँ लाख चलती हों, दिये बुझते नहीं हरदम,
इरादा हो अगर पुख़्ता तो फिर तुफ़ाँ नहीं होता।
शिकस्तें खा के भी हमने यही सीखा है ऐ दिल,
जो गिरकर उठ न पाए वो कभी जवाँ नहीं होता।
तबस्सुम इसलिए क़ायम है इस वीरान दिल में,
कि ज़िंदगी से हार मानना आसाँ नहीं होता।
-राजेश्वरी जोशी
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