पत्थर की मूर्त से निकल कर, इंसान की दुनिया दिखाई थी |
उस दौर की यारों कथा सुनो, जिसने ये ठोकर खाई थी ||
मंदिर मस्जिद गिरजाघर से, धर्म की आड़ मे लंका जलाई थी|
उस दौर मे झाँक के देखो यारों, जिसने ये अलख जगाई थी ||
किस्मत की लकीरें फीकी थी, ज़ब कंगुरा सुना था |
जिने को जिंदगी तो मिली थी, पर आशियाना सुना था ||
ना राम था ना रहीम था, हर पल का रोना था |
भूख-प्यास मिटाने को, दुसरो के भरोसे जीना था ||
भीम जैसा सूरज अगर निकला ना होता,
दलितों के जीवन में ये उजाला ना होता ||
मर गये होते युही जुल्म सहकर,
अगर भीम जैसा रखवाला मिला ना होता।
दलित समाज सुधारक को बाबा साहेब कहते है।
जलते दीपक बनकर सदा हमारे दिल में रहते है ||
अमीरों का दिया हर अत्याचार सहा था उसने,
फिर भी दो वक़्त की रोटी भी कमा ना पाया था ||
अपनी ग़रीबी के आगे, वो बेबस नजर आया था ।
फिर भी दो वक़्त की रोटी भी कमा ना पाया था ।
फ़िर हुआ एक रोज चमत्कार इस धरती पर,
बनकर मसीहा, ख़ुदा धरती पर उतर आया था ।
देश के लिये जिन्होने विलाश को ठुकराया था।
गीरे हुये को जिन्होंने स्वाभिमान सिखाया था।
जिसने हम सबको तूफानों से टकराना सिखाया था।
देश का वो था अनमोल दिपक जो बाबा साहब कहलाया था।
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