क़तरा क़तरा तलाश करता है,
ये समंदर भी कितना प्यासा है।
हमको है एक शख़्स की चाहत,
उसकी ख़्वाहिश तमाम दुनिया है।
तुझसे मिलने की आज ख़्वाहिश है
रात ख़्वाबों में तुझको देखा है
मेरी मंज़िल नहीं है वो लेकिन,
रास्ता उस तलक ही जाता है।
पूछो उनसे जो हैं बुलंदी पर,
किस क़दर भीड़ में अकेला है।
वक्त भरता है घाव को लेकिन,
टीस कब चैन लेने देता है।
वो जो मिलता है अजनबी की तरह,
उसकी आंखों में ख़ुद को देखा है।
ऐ लता इतनी क्यूं उदासी है,
क्या मिला है तुझे जो खोया है।
-रंजनालता
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