सितमगर की आँखों में मुझे क्यों शूल दिखा,
जिसे फूल समझा था, वही बबूल दिखा।
संवरने की तमन्ना अब ख़त्म-सी हो रही है,
हर आईने में अपना ही कसूर दिखा।
जो मेरी आहट पर भी जाँ-निसार करते थे,
वक़्त बदला तो उनका नया उसूल दिखा।
अब उन्हीं आँखों को तरसते बहुत हैं हम,
जिन आँखों में कभी अपना ही वजूद दिखा।
मैंने तो रिश्तों को इबादत की तरह सींचा था,
मगर हर दुआ में कोई अधूरा-सा फ़सूल दिखा।
वो कहते रहे कि फ़ासलों से कुछ नहीं बदलता,
मगर हर मुलाक़ात में बढ़ता हुआ फ़ितूर दिखा।
दिल ने लाख चाहा कि शिकायत न करे उनसे,
मगर हर ज़ख़्म में उनका ही निशान भरपूर दिखा।
-रतन कुमार कैथवास
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