दरिया के उतरते पानी में कुछ हलचल-सी दिखी,
डूबते साहिलों की कोई बेचैनी-सी दिखी।
उसके नग़्मों में अब वो बात नहीं दिखी,
हर सुर में मगर एक अनकही कमी-सी दिखी।
संवरने लगती है ये धरा,
जब मौसम में थोड़ी बरसात-सी दिखी।
सूखे पत्तों की आँखों में भी फिर,
जीने की कोई नई बात-सी दिखी।
जो कल तलक अँधेरों का मातम मनाते थे,
उनकी निगाहों में भी आज एक सौग़ात-सी दिखी।
वक़्त चाहे कितना भी सख़्त क्यों न गुज़रे,
उम्मीद की लौ में हमेशा हयात-सी दिखी।
मैंने टूटे हुए ख़्वाबों को भी समेट कर देखा,
हर किरचे में किसी नई शुरुआत-सी दिखी।
जो लोग हार के बैठ गए राहों के किनारे,
उन्हें मंज़िल बहुत दूर, मगर पास-सी दिखी।
शायद गहराइयों में कोई इंक़लाब-सी दिखी।
उसके नग़्मों में अब वो बात नहीं दिखी,
पतझड़ से पहले सूखे पत्तों को, चूम कर देखा,
नई कोंपलें जैसी, पूरी कायनात फिर जवान-सी दिखी।
-रतन कुमार कैथवास
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