हर वक़्त टूटते तारों को मत देखा करो,
कुछ पल हमारे लिए भी निकाल लिया करो।
तुम्हारी राह में आँखें बिछाए बैठे हैं कब से,
यूँ हर बार सब्र का इम्तिहाँ न लिया करो।
तुम्हारे रूठने के अंदाज़ के भी हम क़ायल हैं,
मगर बिछड़ने का ज़िक्र बार-बार न किया करो।
दिल पहले ही बहुत कुछ हार कर बैठा है यहाँ,
उसकी वीरानियों में और धुआँ न किया करो।
जब कभी दर्द का मौसम मेरी चौखट पर उतरे,
अपने लफ़्ज़ों से थोड़ा-सा उधार दे दिया करो।
मैंने माना कि ज़माने की मशक्कत भी ज़रूरी है,
मगर रिश्तों को यूँ बेवजह तन्हा न किया करो।
तेरी आवाज़ से आबाद हैं मेरे कई मौसम,
यूँ ख़ामोशी को मेरा हमनवा न किया करो।
कल भी तेरे थे, आज भी तेरे ही रहेंगे हम,
हमारी वफ़ाओं को यूँ रुसवा न किया करो।
-रतन कुमार कैथवास
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