मुख पर चटक तिलक लगाकर,
हाथों में ढोंग की माला घुमाकर,
जो बेच रहे हैं ईश्वर को,
इंसानियत का गला दबाकर।
वे जज्बातों से खेलते हैं,
डर का व्यापार खूब फैलाते हैं,
भोली-भाली उस श्रद्धालुओं को,
अंधविश्वास की भट्टी में झुलसाते हैं।
अमृत कहकर जो पिला रहे,
वो भीतर छिपा ज़हर ही है,
आस्था की आड़ में जो ढाया,
वो मासूमों पर घोर कहर ही है।
मज़हब का चोला ओढ़ यहाँ,
जो क्रूर खेल रचे जाते हैं,
भगवान भी रोता होगा ऊपर,
जब उसके बच्चे यूँ काटे जाते हैं।
अब तो खोलो आँखें अपनी,
इस काले धंधे को पहचानो,
जो नफ़रत की भाषा सिखाए,
उसे कभी तुम देव न मानो।
सच्ची आस्था मन के भीतर,
करुणा, प्रेम ही मानवता है,
जो इंसान को इंसान न समझे,
वह तो सबसे बड़ा दानवता है।
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