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औरत की चाह

                
                                                         
                            सदियों से पूछा है जग ने,
                                                                 
                            
कौतूहल के अंगारों पर,
क्या चाह छुपी है नारी की,
इस जीवन के विस्तारों पर?

किसी ने तौला सोने में,
किसी ने रत्न सजाए हैं,
किसी ने केवल नेह-प्यार के,
झूठे महल अंदर बनाए हैं।

पर महलों की इन दीवारों में,
वह उत्तर कहीं न मिलता था,
सच्ची चाहत का वो पौधा,
आभूषण में कब खिलता था?

फिर खुला भेद उस कुरुपता के,
गहरे अंतस के परदे से,
जब टकराया एक सत्य निडर,
इस दुनिया के पाखंडों से।

न कनक चाहिए, न मुकुट चाहिए,
न केवल समर्पण की छाया,
स्त्री को बस अपना आकाश चाहिए,
जहाँ उसकी खुद की हो काया।

वो खुद चुने अपनी राहें,
अपनी हार और अपनी जीत,
सच्ची स्वतंत्रता ही है,
उसके जीवन का आदि-गीत।
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एक घंटा पहले

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