एक-एक ईंट को जोड़-जोड़कर,
जो सुंदर धाम बनाया था,
श्रम की बूंदों से सींच-सींचकर,
छोटा सा महल सजाया था।
पर शासन का आदेश हुआ,
पल भर में सब कुछ टूट गया,
अवैध कहकर उस कुटिया को,
निर्दयता से लौह राक्षस रौंद गया।
जब लोहे के वो भारी वाहन,
घर पर मेरे चलते थे,
मलबे में केवल पत्थर नहीं,
बच्चों के सपने जलते थे।
जो कुछ भी जीवन भर कमाया,
वह माटी में आज मिलाया है,
संबंधों के द्वारों पर हमको,
भिक्षुक सा लाचार बनाया है।
अब सुनो व्यवस्था के ठेकेदारों,
सुनो समाज के रखवालों,
सोने के ऊँचे भवनों में,
अपनी आँखें तो अब खोलो!
क्या पाप है भारत में जनमना,
क्या दरिद्र होना दोष यहाँ?
क्या दोष है निष्ठा की रोटी,
और छोटा सा संतोष यहाँ?
कारागार में भोजन मिलता,
बाहर केवल भूख की ज्वाला है,
न्याय की इस अंधी नगरी में,
किसने किसको मार डाला है?
तुम कागज़ के उस पन्ने को,
हर ईंट से भारी कहते हो,
पर भूख से तड़पते बच्चों को,
क्या कोई तनिक उत्तर देते हो?
सत्ता के इस क्रूर खेल में,
निर्धन कब सुख पाता है?
हर युग में भोला मानव ही,
संकट के घूंट लगाता है।
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