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खुले आकाश को महसूस करने में था

                
                                                         
                            एक सुबह मैं निकली थी,
                                                                 
                            
खुशी और शांति की तलाश में।
ठंडी हवा बह रही थी,
पेड़ मंद-मंद झूम रहे थे।
नीले आसमान में कुछ पंछी,
अपने पंख फैलाए उड़ रहे थे।
उन्हें देखकर मैंने पूछा—
"मैं तो यहाँ किसी उद्देश्य की खोज में बैठी हूँ,
पर तुम इतनी लगन से उड़ते जा रहे हो,
क्या तुम्हारा भी कोई उद्देश्य है?"
पंछियों ने कोई उत्तर न दिया,
शायद वे अपने काम में बहुत व्यस्त थे,
या शायद उन्हें लगा,
हर प्रश्न का उत्तर शब्दों में नहीं होता।
मैंने सोचा,
यदि ये इतने विश्वास से उड़ रहे हैं,
तो अवश्य इनकी कोई बड़ी मंज़िल होगी।
मैंने फिर पूछा—
"क्या तुम थकते नहीं?"
पर उत्तर फिर भी न मिला।
तब मैं उनमें से एक के पीछे चल पड़ी।
वह बहुत आनंद में प्रतीत होता था,
दूर तक गया, फिर लौट आया।
आकाश में गोल-गोल घूमता रहा।
तभी मुझे समझ आया—
शायद उसकी कोई मंज़िल नहीं थी,
शायद उसे किसी लक्ष्य तक पहुँचना नहीं था।
उसका आनंद तो बस उड़ने में था,
खुले आकाश को महसूस करने में था।
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30 मिनट पहले

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