तलाश है मुझे किसी ऐसे की,
जिसके गले लगकर मैं सब भूल जाऊँ,
जो मेरा कवच बन जाए,
जिसे पाकर मैं पूरी हो जाऊँ।
पर जहाँ-जहाँ जाती हूँ,
उन्हें भी खुद जैसा ही पाती हूँ—
जैसे उन्हें भी
किसी ऐसे की तलाश हो।
एक के बाद एक,
मैं उनके पास जाती रहती हूँ,
और हर बार
खुद को अधूरी ही पाती हूं
फिर एक सवाल उठता है—
क्या सचमुच कुछ है भी,
या हमारी तलाश ही झूठी हैं...?
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