जिंदगी की राहो में,सपना बन चलती रही।
मोड़ एसे आया कि,आज तू मेरे साथ नही रही।
दुख होता रहा,सहता रहा ये दिल दर्द।
तू तो भूल ही गई,अब तो होता रहा इस दिल मे दर्द।
दुख इस बात का नही,की तुम चले गए।
दुख इस बात का है कि,इतना दर्द क्यो? दे गए।
आदत सी लग गई थी,तुझे देख कर सुकून पाने का।
आदत सी लग गई थी,तुमसे नजरें मिलाने का।
आदत सी लग गई थी,तुमसे बाते करने का।
आदत सी लग गई थी,तेरी मीठी मुस्कान देखने का।
आदत सी लग गई थी,तेरे आगोस में रहने का।
आदत सी हो गई थी,तेरे घटा भरे काली बालो को देखना।
आदत सी ही गई थी,तेरे मोरनी सी चाल देखा।
एसे आदत लगा कर,विरक्त हो गई मेरे जीवन से।
भुल ना पाऊंगा लगता है, मिली थी तू किस्मत से।
ये दिल रोता है तुझे याद कर,तड़फता है।
खामोश मन से,तेरे यादे,कभी नही निकलता है।
मन पत्थर वीरान बन कर,जीवन से क्यो?चली गई।
पुष्प खिला था इस दिल मे,क्यो?कुचल कर चली गई।
वीराना और अंधियारे में,क्यो?छोड़ तुम चली गई।
प्रेम का बंधन बांध कर,इस दिल को वीराना कर चली गई।
मोह बन्धन में बांध मन को,मन से ही तू चली गई।
सुने पल और वीराने को,मेरे दिल मे क्यो?भर गई।
सपनो से बना महल को,क्यो?कुचल तुम चली गई।
आँखों मे बसने वाली तुम,आँखों को रुला कर चली गई।
दिल मे रहने वाली तुम,दिल को कुचल कर चली गई।
हृदय के सपने तोड़े,पत्थर कैसे तुम बन गई।
मोम से नरम हृदय में,तेज कठोर क्यो?भर गई।
मेरे जीवन के सपनो को,तोड़ -मोड़ कर चली गई।
है आह्वान तुझे मेरा,महकती कलिया काटो से क्यो?बन गई।
मोम का दिल रखने वाली,पत्थर सा क्यो?बदल गई।
मेरे सपनों के शीश महल को,क्यो?पत्थर से तोड़ गई।
जीवन की इस मजधार में,क्यो?अकेला तुम छोड़ गई।
सुकून भरी जीवन को,दुख दर्द से क्यो?भर गई।
रूहानी सा प्यार था मेरा,दिल से दिल का लगाव था मेरा।
हृदय की धड़कन में,तेरे दिल से लगाव था मेरा।
प्यार भरा जीवन ये मेरा,तार-तार तुम कर गई।
मेरे जीवन के हर सपनो को,कुचलता हुवा तुम निकल गई।
लंम्बी गर्त की खाई में,क्यो?मुझे तुम डुबो गई।
सपनो की परछाई से,अब डर सा लगने लगता है।
तेरे आने की आहट से,घबराहट मुझे लगता है।
रातो की काली छाया में,तेरा अक्स दिखाई देता है।
मन विचलित हो कर,अब मुझे डर सा लगता है।
तेरे माथो की बिंदिया भी,दर्द से भर देता है।
कभी मेरे दिल के पास थी,अब बहुत दूरी लगता है।
तेरे आँखों की काजल,काली रात सी लगता है।
अब तो तेरे आँखे भी,डरावनी लगता है।
जीवन का जो पल गुजरा,वापस तुम कर सकते हो क्या?
वक्त मैने बर्बाद किया,वो वक्त दे सकते हो क्या?
मेरे आँखों को,पहली सी ठंडक दे सकते हो क्या?
ओ सुकून भरे दिन,वापस दे सकते हो क्या?
ओ सुख का संसार,वापस कर सकते हो क्या?
ओ प्रेम भरी मीठी मुस्कान,वापस दे सकते हो क्या?
मेरे जीवन मे फिर से,बसन्त ला सकते हो क्या?
मरे गुजरे हुवे वक्त,फिरसे लौटा सकते हो क्या?
किस्मत का मारा हुँ, जीवन तुझे समझता रहा।
हृदय में स्थान दे कर,सम्मान तेरा करता रहा।
आदर और सत्कार,तेरा हमेशा करता रहा।
साथी हमसफ़र बन,साथ तेरा चलता रहा।
हर कसमे वादे,जीवन मे निभाता रहा।
पर तुम मोम से,कब पत्थर बनी पता ही नही रहा।
तू छोड़ चली गई मेरे जीवन से,मैं देखता ही रह गया।
मेरे जीवन मे कब आया अंधेरा,पता ही नही चला।
तू छोड़ चली गई मेरे जीवन से,मैं देखता ही रह गया।
कब आया तूफान,सपनो का आशियाना उड़ गया।
कब आया बाड़ नदियों पर, मेरे सपने बहा ले गया।
तू मेरे जीवन से,अब तो अलविदा ही कह गया।
चली गई जीवन से, हमे जुदा कर गया।
नफरत तो नही था तुझसे, नफरत कर गया।
मोहोब्बत के बदले में,ये कैसा शिला दे गया।
जाते-जाते वफाई का,बेमिशाल इनाम दे गया।
हृदय में लगने वाले,अनोखा ठेस से दिया।
जीवन भर के लिए,दर्द भरी स्मृति दे गया।
तू चली गई मेरे जीवन से,सायद अच्छा ही किया।
अब तो सुकून मिलता होगा, तेरे जीवन को।
अब तो खुसी मिलता होगा,तेरे तन-मन को।
अब तो छोड़ कर चली गई,मेरे इस जीवन को।
खुस रहना आबाद रहना,आप अपने जीवन मे।
सायद अच्छा ही किया,मेरे जीवन को छोड़ के।
तू चली गई मुझे अकेला छोड़ के।
तू चली गई मुझे अकेला छोड़ के।
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