लिख दूँगा मैं ज़ख्म सभी,
क्या तुम मरहम बन पाओगी?
मेरे जीवन के बिखरे स्वर हैं,
क्या तुम सरगम बन पाओगी?
जीवन की अनबन राहों में
सब खोकर बचा अकेला हूँ
मेरे जीवन में बस मायूसी है
मैं भरा दुःखों का मेला हूँ
मेरे जीवन में कड़क धूप
क्या तुम शबनम बन पाओगी?
मेरे जीवन के बिखरे स्वर है
क्या तुम सरगम बन पाओगी?
तुम फूलों की अभिलाषी हो
है बदन तुम्हारा फूलों सा
मैं उजड़ी बागों का माली
है बिस्तर मेरा शूलों का
राह मेरे जीवन की पथरीली
क्या तुम संग-संग चल पाओगी?
मेरे जीवन के बिखरे स्वर हैं
क्या तुम सरगम बन पाओगी?”
-रोहित तिवारी
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