आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इलाहाबाद की लड़की

                
                                                         
                            ‎वो लड़की ठहरी इलाहाबाद की,
                                                                 
                            
‎मैं लड़का अपने गाँव का।
‎उसकी बातें शहर की गलियों सी,
‎मैं सादा सा पनघट छाँव का।

‎वो सपने देखे ऊँची उड़ान के,
‎मैं खेतों की हरियाली में खोया।
‎वो चाँदनी सी चमकती रहती,
‎मैं धूप में तपकर भी ना रोया।

‎फिर भी जाने कैसी डोरी थी,
‎जो दिल से दिल को जोड़ गई,
‎वो शहर की रौनक बन बैठी,
‎मैं गाँव की मिट्टी ओढ़ गया...

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर