वो लड़की ठहरी इलाहाबाद की,
मैं लड़का अपने गाँव का।
उसकी बातें शहर की गलियों सी,
मैं सादा सा पनघट छाँव का।
वो सपने देखे ऊँची उड़ान के,
मैं खेतों की हरियाली में खोया।
वो चाँदनी सी चमकती रहती,
मैं धूप में तपकर भी ना रोया।
फिर भी जाने कैसी डोरी थी,
जो दिल से दिल को जोड़ गई,
वो शहर की रौनक बन बैठी,
मैं गाँव की मिट्टी ओढ़ गया...
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