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एक पैसेंजर ट्रेन

                
                                                         
                            सही कहा हैं ज़िंदगी हैं एक पैसेंजर ट्रेन,
                                                                 
                            
रुकना , चढ़ना और फिर चल देना।

तय हैं उसका हर स्टेशन पर रुकना
तय हैं किसको हैं आना और जाना ।

शुरुआत से आख़िर तक का गंतव्य
सब कुछ हैं एकदम निष्पक्ष तय ।

यूँ चलते मिले राह में कई राहगीर
कुछ हमको या हम उनको हो गम्भीर ।

समझाये और दिखलाये पन्ने सब रंगीन
लिए हाथ में सुन्दर तस्वीर भविष्य की ।

रह जाता हैं फिर भी कुछ पन्नो का पढ़ना
इतना आसान नहीं हर वाक्य की समझना ।

अच्छा ही हैं वरना क्या मज़ा जीने का
जब सुख दुख की परिभाषा हो भिन्न ।

सुख और दुख हैं पूरक एक दूजे के
पर चलता जीवन जब हो मिले हाथ दोनों के ।

हर स्टेशन पर हैं नए साथी संग जुड़ते
और कुछ बीच में ही साथ छोड़ जाते ।

कभीं ख़ुशी कभी गम लिए हम आगे भड़ते
संभव नहीं हैं जीवन इन दोनों के बिन ।

एक दिन हैं हमसबको गंतव्य पर पहुंचना
किसी को आज , कल या परसो हैं जाना ।


 
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एक घंटा पहले

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