बचपन से कई रिश्ते हैं बनाए हमने,
साँसो से बंध कर रहतें हैं हरदम ।
चलना हैं हर पल इनको संग हमारे ,
कभी हट कर लेते या मजबूर कर
उलझा देते अपनी चालाक पहलियों में ।
पर अब सुलझाना हैं इन उलझे धागो को
निकलना है परेशानियों के भवंडर से ।
यूँ तुम धैर्य ना खोओ, उठ बैठ संभल
याद कर हर उस एक सबक को ,
पग पग पढ़ा जिसे जीवन पाठशाला में ।
हल हैं जिसमे हर एक उस उलझन का ,
बँधा पाया जिसमे तुमने अपने को ।
कर कोशिश ,रख धैर्य ,उठ बैठ संभल
दिखा तेज़ सूर्य सा , क्यों छुपा रखा हैं?
तुमको चमकना तय हैं , मत घबरा
उठ बैठ संभल ।
बस आगे बढ़…..बस आगे बढ़ !!!!
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