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अब समय है- विश्राम

                
                                                         
                            "सोशल मीडिया हो या अमर उजाला का मंच,
                                                                 
                            
लगता है कलम अब कुछ ठहर-सी गई है।
शब्द तो हैं, पर उनमें पहले जैसी ऊष्मा नहीं,
भाव तो हैं, पर उनमें वह गहराई नहीं।
जो कभी मित्रों की पसंद और अपनापन पाती थी,
वह रचनाएँ अब शायद वैसी प्रतीक्षा नहीं जगातीं।
मन के किसी कोने से एक आवाज़ उठती है—
शायद अब कुछ समय विश्राम का है,
कुछ पल स्वयं से मिलने का है।
क्योंकि हर कलम को नई उड़ान से पहले,
थोड़ा ठहरना भी ज़रूरी होता है..!!
-संजय श्रीवास्तव
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एक घंटा पहले

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