नवल प्रभात नमन से पहले, ज़ख्म पुराने याद मुझे,
उजड़े खेत, लुटी जो दौलत, वे दिन रोदन-याद मुझे।
सत्तावन के अमर सिपाहियों का वह गर्जन याद मुझे,
गांधी का नैतिक पथ, बोस का ज्वाला-दर्शन याद मुझे।
अज़ाद हिंद फौज और नौसेना का वह प्रचंड हुंकार याद मुझे,
जब थका हुआ साम्राज्य अंततः झुकने को विवश हुआ,
तब पराधीन भारत स्वतंत्र राष्ट्र बनकर उदित हुआ।
इस पावन सांस्कृतिक निधि को नित समृद्ध ही करना है।
‘अमरीकन ड्रीम’ से प्रेरित हो, पर अपना ही रूप दिया,
हमने अपने ‘इण्डियन ड्रीम’ को नया अनोखा भूप दिया।
जहाँ स्वतंत्रता का अर्थ बने कर्तव्य, समर्पण, धर्म-अटल,
अनुशासन, स्वाभिमान, ज़मीर ही हों जीवन के मर्म-अटल।
द्वितीय युद्ध में ध्वस्त जर्मनी, बर्लिन-दीवार गिराकर फिर उद्योग-शिखर पर जा बैठा,
परमाणु-ज्वाला सह जापान, अनुशासन-तकनीक के बल पर नव-इतिहास रचा-ऐंठा।
होलोकॉस्ट का दंश झेल, इज़राइल ने रक्षा-शोध से अपनी नई पहचान गढ़ी,
रूस, चीन, यूरोप की धरती भुखमरी-युद्ध से उबरकर जग-शिरोमणि बन आगे बढ़ी।
जब घोर विनाश से निकल सभी ‘विकसित’ कहलाए अपने कर्म-बल पर,
फिर क्यों भारत अपनी निर्धनता को ही तक़दीर कहे?
पाँच हज़ार बरस का गौरव जागे, हम निज ‘इण्डियन ड्रीम’ साकार करें,
उठो! नए युग का संकल्प लें और नव-भारत का दृढ़ निर्माण करें!
क्यों सदियों की इस पीड़ा को चुपचाप यहाँ की पीढ़ सहे?
दो सदियों का यह संधि-काल, माँगे हमसे उत्तर महान,
२०४७ में गूँजेगा कैसा अपना भारत-विधान?
सपना ऐसा: जहाँ विद्यालयों में जिज्ञासा का वास बने,
अस्पतालों में धन से ऊपर जीवन की ही आस बने।
त्वरित, न्यायपूर्ण कानून जहाँ निर्बल का सच्चा ढाल बने,
सड़क, बंदरगाह, बिजली, रेल का ऐसा उन्नत जाल बने।
जहाँ माइक्रोचिप, रॉकेट, AI से भारत विज्ञान की मशाल बने।
स्वदेशी सामर्थ्य से चमके भारत का अर्थ-जहाँ नया।
वैज्ञानिक बल से सुसज्जित हों अपने वीर जवान यहाँ,
कल के निर्मित साधन आयातित न हों, रचें निर्माण यहाँ।
चीन-दृष्टि, जापान-निष्ठा, अमरीका का उद्यम ले लें,
भूटान-शांति का मार्ग चुनें, जग के सब उत्तम गुण ले लें।
पर चरित्र हो अपना ही, विवेकानंद का ओज जगे,
हर भारतवासी के भीतर नव-चेतन की नव-ज्योति जगे।
पूछो मत: “क्या दिया देश ने?”, गूँजे बस यह प्रश्न प्रखर
“मैं क्या गढ़ सकता हूँ जिससे भारत रहे सदा स्वाधीन, अमर?”
दौलत बढ़े सम्मान-सहित, हो शक्ति मगर अभिमान न हो,
कर्तव्य-ज़मीर का मार्ग चले, निष्ठा का कभी अवसान न हो।
भारत तभी महान बनेगा, जब जन-जन मन में सत्य भरे,
आओ मिलकर उस नए क्षितिज पर, नव-भारत का निर्माण करें!
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