आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आतपी अस्तित्व

                
                                                         
                            कंठ में गरल ग्रंथि
                                                                 
                            
रोक कर उपस्थित हूँ यहाँ मैं
जो प्रमाणित कर रही
विरल अस्तित्व को मेरे
जन्मा भुवन में रज रज मेरी
कर्म-कृत्य में लिप्त यहाँ मैं
हूँ फिर भी निर्लिप्त सा हर विधा में
न हूँ मैं शिव के जैसा
न हूँ मैं सौम्य नारायण सा
नर हूँ मैं आतपी सा
-सत्यनिधि द्विवेदी 'अंशिल'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर