कंठ में गरल ग्रंथि
रोक कर उपस्थित हूँ यहाँ मैं
जो प्रमाणित कर रही
विरल अस्तित्व को मेरे
जन्मा भुवन में रज रज मेरी
कर्म-कृत्य में लिप्त यहाँ मैं
हूँ फिर भी निर्लिप्त सा हर विधा में
न हूँ मैं शिव के जैसा
न हूँ मैं सौम्य नारायण सा
नर हूँ मैं आतपी सा
-सत्यनिधि द्विवेदी 'अंशिल'
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