तुम्हें लगता है कि अपनी नाकामियों को छिपा लोगे,
तो सुनो, ये तुमसे ना हो पाएगा।
तुम्हें लगता है कि लोगों की आवाज़ के पन्ने बंद कर दोगे,
तो सुनो, ये तुमसे ना हो पाएगा।
तुम्हें लगता है कि सच्चाइयों को झुठला दोगे,
तो सुनो, ये तुमसे ना हो पाएगा।
खरीदकर अख़बार के हुजूरों को,
तुम्हें लगता है कि अर्जियां मिट जाएंगी,
तो सुनो, ये तुमसे ना हो पाएगा।
उठेंगी लाख आवाज़ें हमारे चमन में,
जब खड़ी होंगी सवालों की दीवारें,
घेरकर तुमसे अपना हक़ मांगेंगी,
तब जाओगे किधर, किससे मांगोगे माफी?
जनता के पैरों में झुकना पड़ेगा तुम्हें,
पर सुनो…
ये तुमसे कभी ना हो पाएगा।
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