आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हिफाज़त

                
                                                         
                            कपड़े कभी
                                                                 
                            
हिफाज़त का सबूत नहीं होते,
असली हिफाज़त तो
निगाहों से होती है।
इंसान के देखने के भाव से होती है
क्या देखता है और
क्यों देखता है?
सब ये निगाहेँ ही तो होती हैं।
जो फर्क समझती हैं
सही और गलत का,
वही इज़्ज़त भी देती हैं,
वही लूट भी लेती हैं।
ये नज़रें ही परदा बनती हैं,
और यही बेपर्दा भी कर देती हैं।
-शाहाना परवीन 'शान'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर