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जिंदगी की ढलती शाम

                
                                                         
                            जिंदगी की ढलती शाम
                                                                 
                            

जब उदासी छाई हो सांसो में
जिंदगी एक ढलती शाम बन जाती है
कहती नहीं कुछ किसी को भी पर
जिंदगी की ढलती शाम
उभरकर सामने आ जाती है।
कुछ कह देते कि 'कुछ नहीं', बात है छोटी सी
पर कहीं छोटी बात बड़ी बन जाती है।
जिंदगी की ढलती शाम
उभरकर सामने आ जाती है।
न कुछ तेरा, न कुछ मेरा यही जीवन है,
जो समझ गया पार वही यहाँ लग गया है।
अहंकार जब करता घर मन में,
जिंदगी नरक बन जाती है।
जिंदगी की ढलती शाम
उभरकर सामने आ जाती है।
बातों का क्या है आज है कल नहीं
इंसान भी कहाँ यहाँ ठहर पाया है?
जो आया, जाना उसे दूसरी दुनिया में,
यहाँ आकर कौन भला बस पाया है?
बातें यादें बन कर सताती हैं।
जिंदगी की ढलती शाम
उभरकर सामने आ जाती है।
-शाहाना परवीन 'शान
 
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5 दिन पहले

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