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समंदर सा गहरा पानी

                
                                                         
                            कभी बहता पानी है, तो कभी ठहरा पानी है,
                                                                 
                            
झील सी आँखों में समंदर सा गहरा पानी है।

ऊपर से  ख़ुश्क नज़र आने वाली  आँखों में,
ज़रा उतर के तो देखो कितना गहरा पानी है।

ग़म-ए-दिल कम-ओ-बेश बयाँ करती आँखें,
मंज़र हो या पस-मंज़र हर-सू गहरा पानी है।

सीने में निहाँ  दर्द से छलकती हुई आँखों से,
रह-रह के मचलता भीतर का गहरा पानी है।

अपने भीतर न जाने कितने राज़ छुपाए हुए,
घुटने  पर मजबूर  आँखों का गहरा पानी है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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9 घंटे पहले

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