मेरी माँ ने अपने पाँव में आलता लगायी थी
अक्सरहाँ जब उसकी ज़िंदगी के रंग....
फीके पड़ने लगते हैं तब वह अपने पाँव में....
लाल रंग भर लेती है।
लाल रौद्र का प्रतीक है....!
वह रौद्र जो उसे किसी ने दिखाने का हक नहीं दिया।
लाल रंग जंग का प्रतीक है....!
वह जंग जो वह हर दिन खुद से लड़ती है।
औरत से लाल रंग ने....
हमेशा कुछ ना कुछ छीना है।
लाल रंग का खून ने....
पहली बार उससे उसकी मासूमियत छीना है।
लाल रंग का सिंदूर....
उससे उसकी आज़ादी छिना है।लाल रंग के शादी का जोड़ा....
उससे उसकी पहचान छिनी है।कहते हैं!लाल रंग औरतों पर बहुत शोभता है....
वह देवियाँ लगती हैं महावर लगा के।
लाल रंग उसे सजाकर देवियाँ बना कर....
इनसे ये रंग इनकी इंसानियत भी छीन लेती है।
तो,आज मेरी माँ अपने पाँव में आलता लगा....
पूरे घर में इधर-उधर काम करते वक्त....
अपने मन के युद्ध की निशानी छोड़ रही थी।
रात जब मैं सोने आई तो देखी कि....
मेरे पाँव के तलवे भी लाल हो गए हैं।
कहते हैं!कि जब एक औरत माँ बनी भी नहीं होती....
तब उसके शरीर में जो अजन्मी ज़िंदगी होती है
उस पर उतना ही असर पड़ता है उन सब चीज़ों का जितना कि उस औरत पर
जो उसे अपने शरीर में लेकर जी रही होती है।
और,जब एक लड़की पैदा होती है....
तो,वह अपनी माँ और नानी की जी हुई ज़िंदगी....
विरासत में लेकर पैदा होती है।
उस विरासत से जूझते हुए उसे.... अपना खुद का रास्ता तय करना होता है।
यह उम्मीद करते हुए कि....
जो उसकी माँ और नानी ने झेला है....
वह उसी तक सीमित रह जाए। उसकी बेटी उन राहों पर कभी न चले....
जिस पर उसे और उसकी माँ को चलना पड़ा।
खैर,कल एक नया दिन है....
मेरी माँ उन्हीं पुरानी जंगों को लड़ेगी।
और,दोपहर तक चलते-चलते....
मेरे पाँव से मेरी माँ के पाँव का रंग शायद उतर जाएगा!!!!!
-शुभांगी श्री
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