रक्त-संबंध अब मौन सिसकते,
प्राण-प्रिय भी दूर छिटकते।
स्नेह-नीड़ जो कभी बना था,
वहाँ आज बस स्वप्न भटकते।
शुष्क हुई ममता की धारा,
अस्त हुआ वह ध्रुव-तारा।
बंधु-जनों की इस संसृति में,
हृदय हुआ है आज सहारा।
भित्तियों पर चित्र उदासी,
भाव हुए अब रिक्त प्रवासी।
जिन हाथों ने थामी उँगली,
वे ही बने आज वनवासी।
मौन खड़े हैं चौखट द्वारे,
सब बंधन अब हारे हारे।
जिन अधरों पर आशीषें थीं,
वे ही आज हुए अँगारे।
छलनी हुआ हृदय का कोना,
शेष रहा बस छुपकर रोना।
स्वर्ण सरीखे जो संबंधी,
कठिन हुआ अब उनको ढोना।
समय चक्र की करुण कहानी,
रिश्तों ने बस पीर ही जानी।
अंत-समय में प्यास जगी जो,
मिलता नहीं नयन का पानी।
विलय हुआ अहसास पुराना,
दुस्तर हुआ बोझ उठाना।
सत्य 'मुकुंद' हुआ यह जीवन,
स्वयं को ही अब स्वयं भुलाना।
- सनातन मुकुंद
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