यह क्षण
किसी तिथि का बंधन नहीं,
यह वह अंतराल है
जहाँ समय भीतर झुककर
अनंत के दीप जलाता है।
अयोध्या—
केवल नगर नहीं,
वह सूक्ष्म प्रदेश है
जहाँ चेतना की नदियाँ
मौन में प्रवाहित होकर
स्वयं को खोजती हैं।
कौशल्या—
शब्दों में सीमित नहीं,
वह वह अनंत गर्भ है
जिसमें करुणा पहली बार
स्वर पाती है,
और प्रेम अपनी सीमा भूल जाता है।
दशरथ—
वह प्रतीक्षा है
जो वर्षों तक भीतर जलती रहती है,
एक अज्ञात दीपक की तरह,
जो कभी नहीं बुझता।
राम—
नाम नहीं,
वह वह गहन स्पंदन है
जो भीतर उतरते ही
सत्य और करुणा के मध्य
संतुलन स्थापित करता है।
रावण—
बाहर का नहीं,
चित्त का जटिल भ्रम है—
अहं का जाल,
जो स्वयं को ही पकड़ने में असमर्थ।
और राम—
उस जाल में एक शांत केंद्र,
जहाँ केवल साक्षी का विस्तार है,
जहाँ समय, स्थान और आत्मा
एक सूत्र में बंध जाते हैं।
जन्मोत्सव—
दीपों और नगरों की घटना नहीं,
यह वह क्षण है
जब भीतर का अंधकार
स्वयं को पहचानकर
प्रकाश के महासागर में विलीन हो जाता है।
श्वास मंत्रित हो जाए,
मौन अनाहत नाद बने,
अयोध्या जाग उठे भीतर,
जब आत्मा राम को अपना ले।
दीपों से अधिक दीपित,
अंतःप्रकाश की ज्योति,
अंतर के वन में खिलती
करुणा और शांति की गति।
राम का जन्म
न क्षणिक, न केवल ऐतिहासिक कथा,
यह हर हृदय का उद्घाटन है—
अंधकार से प्रकाश की दिशा।
सतत् पथ पर चलना,
नाम-जप और ध्यान,
वही राम का जन्मोत्सव,
वही दिव्य प्रदीपन।
- सनातन मुकुंद
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