असीम-अनुराग था पर हम, नियति की चाल से हारे,
परिस्थितियों ने मिलकर, लिखे निर्णय यहाँ सारे।
ज़माने, भय और दूरी ने, किया चुप प्रेम का अध्याय,
बहाकर अश्क आँखों से, बुझे दो भाग्य के तारे।
झुकाकर सर ज़माने के, नियम को मान तुम तो गईं,
परिस्थितियों की चौखट पर, सजा अफ़सान तुम तो गईं।
विवशता ओढ़कर आख़िर, उन्हीं के रंग में रँगकर,
'अनंत प्रतीक्षा' को ही, बनाकर जान तुम तो गईं।
तुम्हारे बाद जीवन को, विरह की पीर दे आया,
मैं अपनी ही हथेली पर, अधूरी लकीर दे आया।
तुम उन मजबूरियों की हो गईं, संसार को चुनकर,
मैं ख़ुद को एक 'अनंत इंतज़ार' की जागीर दे आया।
नियति के क्रूर हाथों का, वो बस व्यापार होना था,
परिस्थितियों के आगे, हमारा हार होना था।
ज़माने,
भय और दूरी ने, लिखा जो मौन का पन्ना—
हमारे प्रेम-अध्याय का, यही अंतार (अंत) होना था।
विवशता ओढ़कर तुम तो, किसी का संसार हो बैठीं,
किसी की सेज की रौनक़, किसी का प्यार हो बैठीं।
मगर मैं आज भी तन्हा, सिसकती रात में रोकर—
तुम्हारी उस 'अनंत प्रतीक्षा' का, गुनहगार हो बैठा ।
परिस्थितियों के आगे, जो झुका वो हार बैठा है,
जो तुमको पा नहीं पाया, वो सब कुछ वार बैठा है।
मगर इस शून्य आँखों में, 'अनंत प्रतीक्षा' है—
दिलों के टूटते मंज़र, ज़माना बार बैठा है।
सुलगते आंसुओं पर अब, कोई अधिकार नहीं है,
हमारी दास्ताँ का अब, कोई ग़म-ख़्वार नहीं है।
ज़माने ने बदल डाला, हमारे प्रेम का पन्ना—
वो जिसके थे कभी हम, वो हमारा यार नहीं है।
परिस्थितियों की बाँहों में, सिमट कर मौन हो तुम तो,
सुहागन बन गई उनकी, जो मेरा कौन हो तुम तो।
मगर मैं आज भी तन्हा, 'अनंत प्रतीक्षा' बनकर—
सिसकती रात में रोती, कोई धुन-गौन हो तुम तो।
जुदा हमसे हमारा ही, यहाँ हर ख़्वाब होता है,
नियति के फ़ैसलों का दर्द, ही बे-हिसाब होता है।
ज़माने,भय और दूरी ने, किया जो मौन उस को अब—
हमारी दास्ताँ का वो, अधूरा बाब (अध्याय) होता है।
-शीतल राज 'किशोर'
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