मैं शब्दहीन, मैं सारहीन, मैं स्वयं के प्रश्नों पर मौन हूँ।
हे कृष्णा! अब तुम्हीं बताओ, आखिर मैं कौन हूँ?
ना शब्दहीन, ना सारहीन, तुम मौन की सुंदर भाषा हो।
प्रेम का वृहद रूप तुम राधे, स्वयं एक परिभाषा हो।
.- शिवांश शुक्ल
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