वेदों की सभी ऋचाओं में
आसमां की खुली घटाओं में
बागों की चली हवाओं में
सिर्फ नजर तुम आती हो
भवरों की बोली सुनता जब
एक सलोना सपना बुनता जब
स्वप्नों की गहराई में
सिर्फ नजर तुम आती हो
गीता का कोई सार सुनूं
वीणा का कोई तार सुनूं
या शर की मैं झंकार सुनूं
सिर्फ नजर तुम आती हो
सुनसान अंधेरी रातों में
दूर कहीं सन्नाटो में
खुद से खुद को बातों में
सिर्फ नजर तुम आती हो
-शिवांश शुक्ल
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