न कोई शोर, न कोई वचन,
बस मौन तुम्हारा गहरा है,
जिसे समझ न पाया जग सारा,वही तो ज्ञान सुनहरा है।
तुम आए तो कुछ छूट गया,
कुछ अपना दूर हुआ,
पर पीछे मुड़कर देखा तो,
मन थोड़ा मजबूर हुआ।
जिसे समझा था जीवन अपना,वह केवल एक पड़ाव था,
जिसे समझा था अंत प्रभु,
वह नई राह का ठहराव था।
तुमने खाली हाथ किए तो,
हाथों की कीमत जानी,
तुमने जब सहारा छीना,
अपने भीतर शक्ति पहचानी।
तुमने मौन दिया तो जाना,
शब्द हमेशा जरूरी नहीं,
हर उत्तर बाहर मिलता हो,
ऐसी भी कोई दूरी नहीं।
तुमने रातें लंबी कीं तो,
सुबह का अर्थ समझ आया,
एक छोटी-सी किरण ने फिर,जीना मुझको सिखलाया।
तुमने धीरे चलना सिखाया,
दौड़ बहुत थी जीवन में,
रुककर खुद को देख सका मैं,पहली बार दर्पण में।
तुमने ताज नहीं माँगा मुझसे,
न वैभव का उपहार,
बस इतना कहा-सच्चा रहना,बाकी मैं हूँ जिम्मेदार।
जो टूट गया, उसे जोड़ दिया,
जो झुक गया, वह ऊँचा हुआ,
जिसने खुद को जान लिया अंततः,वही तुम्हारा सच्चा हुआ।
हे शनिदेव अब भय नहीं है,
तुमसे कोई शिकायत नहीं,
जो भी दिया, किसी वजह से दिया,तुम्हारी कोई भूल नहीं।
बस इतना आशीष रहे प्रभु,
मन में सत्य का दीप जले,
समय चाहे जैसा भी हो,
विश्वास हमारा साथ चले।
तुम दंड नहीं, वह सीख हो,
जो जीवन पढ़ना सिखलाए,
तुम वह ठहराव हो शनिदेव,
जो इंसान को खुद से मिलवाए।
नीले नभ के मौन प्रहरी,
तुमको मेरा नमन रहे,
जीवन की हर कठिन घड़ी में,मुझमें मेरा धैर्य रहे।
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