लिख रहा हूं प्रिय…
तुम्हारी याद में कुछ नगमे।
गुनगुना रहा हूं प्रिय…
तुम्हारी याद में कुछ नगमे।
हम क्यों मिले?
मिलकर क्यों जुदा हुए?
अब तो ना दिन गुजरता है,
ना गुजरती है रातें।
बस, प्रिय तुम्हारी याद में…!
सोचता हूं…
इन सर्द हवाओ में मैं मिल कर
तुम्हारी बदन को छू जाऊं।
सोचता हूं…
इन चहकती पंछियों संग
तुम्हारा नाम पुकारूं।
मगर, मायूस और खामोश बैठा हूं।
केवल और केवल प्रिय
तुम्हारी याद में!
-कुमार किशन कीर्ति
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