अपने साए से भागना होगा
क्या ख़बर थी ये हादिसा होगा
ख़ामुशी को ज़बाँ न दे ऐ दोस्त
घर में हर वक़्त शोर सा होगा
मेरी पहचान के लिए तुम को
अपना माज़ी कुरेदना होगा
फ़स्ल वहमों की पक चुकी होगी
अब वो शो'ले बटोरता होगा
ख़ुदकुशी उस की बेबसी होगी
वो भी कब मरना चाहता होगा
यूँ तो तुम भी ज़बान रखते थे
कुछ भी कहते न बन पड़ा होगा
वो जो ख़ुश था 'नरेश' मेले में
घर पहुँचते ही रो दिया होगा
~ डॉ. नरेश
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