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ए बी सी डी या स्वर व्यंजन

                
                                                         
                            ए बी सी डी या स्वर व्यंजन,इन्हीं से सारी भाषा है।
                                                                 
                            
इन्हीं से ग्रन्थ पुराण बने है, इन्हीं से सारी गाथा है।

इन्हीं से भक्तगण भजन हैं करते, इन्हीं से मंत्र बने सारे।
इन्हीं से जीवन प्यारा बनता, इन्हीं से रिश्ते है प्यारे।

इन्हीं से अमृत रस बनता है, इन्हीं से विष भी है न्यारे।
इन्हीं से उग्र रूप है बनता, इन्हीं से बिगड़े घर सारे।

इन्हीं से सारी दुनिया बनती, इन्हीं से हैं संबंध हमारे।
अच्छे कर्म से मान है बढ़ता, मरकर भी अमर ही रहता प्यारे।

मंदिर में मां आरती गाई, खड़ा साथ में बच्चा प्यारा।
हाथ जोड़कर सीख रहा था,ले शब्दों का मधुर सहारा।

माँ ने धीरे से समझाया तब—
"बेटा, यही अक्षर हैं जग में, इनसे जग सारा उजियारा।
मीठी बोली से सुख मिलता, तीखा वचन करें अंधियारा।"

शब्दों से ही प्रेम पनपता, शब्दों से ही बैर बढ़े,
जैसा बोओ वैसा काटो, यही नियम जग सदा पदे।

इन अक्षरों की शक्ति अपार, ये सृजन करें, ये संहार,
इनसे ही इतिहास लिखे हैं, इनसे ही बदलें व्यवहार।

इसलिए सदा सोच समझकर, वाणी को आकार देना,
शब्दों में हो प्रेम, करुणा—यही जीवन का सच्चा गहना।
-सूबा लाल "अंजाना"
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