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जीवन यात्रा — एक दार्शनिक दृष्टि

                
                                                         
                            शुरू हुई जब जीवन यात्रा, प्रश्नों का संसार मिला,
                                                                 
                            
कौन पथिक हूँ, कहाँ से आया—मन को यही विचार मिला।

अंतिम लक्ष्य धुंधला सा है, फिर भी चलना पड़ता है,
हर उत्तर की खोज में मानव, खुद से ही वह लड़ता है।

राहों में जो फूल खिले हैं, क्षणभर का उपहार हैं,
काँटों की है चुभन बताती—सच में हम तैयार हैं।

नाले, नदियाँ, पर्वत ऊँचे—बाधा नहीं, संकेत हैं,
रुकना, झुकना, फिर उठ जाना—जीवन के ये रीत हैं।

प्रकृति कभी जब मौन हो जाए, परिस्थितियाँ साथ नहीं देवें।
तब भीतर की ज्योति जगाकर,लड़ने का प्राण ले लेवें।

पर्वत काटे हैं किसने कब—ये भी एक प्रतीक मात्र है,
असली पर्वत मन के भीतर, उसको जीतना खास है।

मिलते राहों में जो चेहरे, दर्पण हैं पहचान के,
कोई अपना, कोई पराया—सब अंश हैं इस ज्ञान के।

हँसी, खुशी, संवाद, विरह—सब अनुभव की धारा है,
जीवन केवल चलना ही नहीं, समझना भी ध्येय हमारा है।

कुछ ठहरेंगे, कुछ बिछड़ेंगे—ये क्रम अनंत पुराना है,
मोह त्याग कर आगे बढ़ना, यही सत्य को पाना है।

छोटी सी यह जीवन यात्रा, फिर भी गूढ़ पहेली है,
जिसने खुद को जान लिया, उसकी हर राह सुहेली है।

न रार, न द्वेष, न अहंकार—बस प्रेम ही आधार बने,
मानव जीवन मंदिर जैसा, हर श्वास में विस्तार बने।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
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