आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

माँ की मोहब्बत

                
                                                         
                            दर्द का मर्म माँ की ममता ही समझ सकती है,
                                                                 
                            
बेटा खामोश क्यों है माँ ही बता सकती है।
सभी बातों पर शिकायत ही इसका हल तो नहीं,
बिन कहे ही माँ हर हालात बदल सकती है।

कुछेक रिश्तों ने आवाज़ हिम्मत हीन किया।
माँ की ममता फिर भी बेटे को बुला सकती है।
चेहरे की मुस्कान भले दर्द को छुपा लेवे,
माँ की आँखें उसे पढ़कर के जान सकती हैं।

बेटा कितना भी दूर हो जाए माँ की आँखों से ,
माँ की दुआयें हर कदम उसके साथ रहती हैं।
बेटा पूछे न हाल, फिर भी माँ समझती है,
एक आहट भी उसके मन की बात कहती है।

अब तो दर्द और खामोशी भी दोनों अपनी है,
माँ से मिलना ही शायद दर्द बदल सकती है।
बेटे के सिर पे आज भी जो माँ आँचल है,
उसी से दुनिया की हर कष्ट पिघल सकती है।

आज दुनिया को क्या बताऊँ, 'अंजाना' रिश्ता,
माँ-बेटे की मोहब्बत लफ़्ज़ों में नहीं ढल सकती।
तन्हाई में माँ की याद आँखें भिगो देती है,
उसकी एक दुआ ही किस्मत को बदल सकती है।

माँ से बढ़कर कोई हमदर्द नहीं हो सकता,
उसके जैसा कोई अपना भी नहीं हो सकता।
बेटा चाहे लाख छुपा ले अपने मन का दर्द,
माँ से छुपा हुआ कोई दर्द भी नहीं होता।
- सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर