उसको दे दी खुशी
उसे हँसी भी ना आई
वो तो थी बदनसीबी मेरी
मुझे तब क्यों ना वो समझ में आई
जब वो समझ में आई
फिर कुछ भी ना मेरे समझ आई..
क्या दोहरा माप दंड है
स्थिति प्रचंड है
सब खंड खंड है
क्या कुछ भी पल्ले आई
जब तक कुछ भी पल्ले आती
तब तक सबकुछ दूर चली जाती
है ये आडंबर या मानवता की पराकाष्ठा
जीवन फिर भी चलती रही
ये दिल और तन मन धन की गाड़ी
यूं हीं सतत् अग्रसर होती रही
मैं इंतजार करता वो मिलती रही
बिन जाने माने पहचाने ये महफिल
यूं हीं सजती रही...
घंटियां दिलों ने बजती रही
यूं हीं दिलों में घंटियां बजती रहीं....
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