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अस्तित्व की रेल

                
                                                         
                            स्त्री की अद्भुत सहनशक्ति को मैंने,
                                                                 
                            
रेल के भीड़ भरे डिब्बे में देखा।
नशे में चूर अपने पति को सँभालते देखा,
गोद में सुबकते नन्हे शिशु को दुलारते देखा।
सुनी उस पुरुष की निष्ठुर चिल्लाहटें बार-बार,
पर उस महान शक्ति को मौन, निर्विकार देखा।
न लबों पर कोई शिकायत, न कोई आह निकली,
तमाम वर्जनाओं को चुपचाप सहते देखा।
खिड़की के पार टकटकी लगाए ईश्वर को निहारते,
नम आँखों से बहते उन मूक आँसुओं को देखा।
अपने हिस्से का निवाला भी बच्चों को खिलाते,
ममता की उस पराकाष्ठा को जीते देखा।
दिनभर की झिड़कियों से बोझिल वह चेहरा,
अकेलेपन के गहन चिंतन में डूबा मन देखा।
घुटते हुए जज्बात और सिसकती उन यादों को,
मैंने रेल के उस लोकल डिब्बे में मरते देखा।
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एक घंटा पहले

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