बहुत अच्छा लगता है लोगों के तानों से,
अब डर नहीं लगता उनके अफ़सानों से।
जो कल तक मुझे गिराने की कोशिश करते थे,
आज वही परेशान हैं मेरी उड़ानों से।
जलने वालों! तुम्हारी चाहत है मुझे गिराने की,
मगर मेरी आदत है गिरकर फिर उठ जाने की।
तुम क्यों अपना कीमती वक़्त मुझ पर गँवाते हो,
मुझे आदत है अपने हौसलों से उठ जाने की।
तुम पत्थर फेंकते रहो, मैं रास्ते बनाता रहूँगा,
तुम रोकते रहो, मैं आगे बढ़ता रहूँगा।
तुम्हारी हर साज़िश मेरी ताक़त बनेगी,
मैं हर ठोकर से अपनी नई पहचान बनाता रहूँगा।
मुझे गिराने की कोशिश तुम बार-बार करते रहना,
मैं हर बार पहले से ऊँचा उठता रहूँगा।
तुम मेरी राह में काँटे बिछाते रहना,
मैं उन्हीं काँटों पर चलकर
अपनी मंज़िल तक पहुँचता रहूँगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X