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उगता सूरज

                
                                                         
                            आसमान की छाती को चीरता
                                                                 
                            
वो निकलता है क्षितिज से
गेरुए रंग के वस्त्र ओढ़े
शांत, सहज,निर्मल, पवित्र
किसी पुजारी की चादर सा, दिव्य आभा को समेटे

धीरे-धीरे बिखेर देता है
अपनी स्वर्णिम आभा को प्रकृति के कण-कण में
काली अंधेरी रात के निशान मिटाता
रोशन करता जाता है हर इक कोना
जहाँ भूले से भी अंधेरे ने छोड़ दिया हो
निराशा और उदासी भरा कोई निशान

धवल चोटियों पे बिखेर देता है
स्वर्णिम किरणों की स्वर्णिम आभा
जैसे शांत रस को मिल जाये संग
आराध्य के पास आने से उत्पन्न उत्साह का
बंद पंखुड़ियों को मिल जाता है संदेश
वक़्त आ गया है उनके खुलके मुस्कुराने का

थकी हारी सोयी मानवता
जाग जाती है एक अंगड़ाई लेकर
सूरज की किरणें पहुँच जाती हैं आँगन में
आलस को त्याग कर्म का संदेश लेकर
चहचहाते पंछी फैला लेते हैं पँख अपने
फिर से छूने को बादलों के पार कोई दुनिया

भोर का उगता सूरज
सिर्फ़ रात के अंधेरे को ही नहीं मिटाता
मिटाता है हमारे अंदर के हर उस डर को
जो अंधेरों में लिपटा हो
मिटाता है हर उस दुर्भाव को
जो अंधेरों को बढ़ाता है
जगाता है वो उम्मीद की किरण
जो हर अंधेरे को चीर रोशनी की तलाश करे
जो मानव-मानव में ये विश्वास जगाये
कि हर अंधकार को मिटाने एक सूरज ज़रूर उगता है।
-सुरेखा कादियान 'सृजना'
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4 दिन पहले

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