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कागजों में कैद स्वराज

                
                                                         
                            क्या इसलिए देखा था वह स्वराज का सपना?
                                                                 
                            
आज भी स्वराज तो है, लेकिन सिर्फ किताबों में।
जनता तो झेल रही है राज मनमानी का,
भ्रष्टाचार बन गया है मामूली
कहीं बन न जाए यही देश की निशानी ।

ताज़ा ख़बर बस एक ढोंग है,
असली सच्चाई से जनता को वाक़िफ़ करा रहा कोई और है।
टीवी, अख़बार, मीडिया की हेडलाइन पर
सिर्फ वोट के विज्ञापन का शोर है,
आज भी ग़रीब पर बड़े लोगों का ज़ोर है।

बेरोज़गारी, दंगे, भुखमरी, रेप, विवाद—
सब कुछ थोड़ी देर की है बात;
कुछ वक़्त के बाद पीड़ित को हर कोई भूल जाता है।
15 अगस्त पर ही क्यों
सबको “मेरा देश महान” का नारा याद आता है?

देशभक्ति बन चुकी है बस एक दिखावा,
असली देशभक्त कोई नज़र नहीं आता।
2026 में भी भारत के किसी कोने में पड़ रहा है अकाल
लोकतंत्र है या नहीं,
यह बनता जा रहा है सवाल।

अंधविश्वास मानो हो चुका है सामान्य,
भगवान के नाम पर लोगों को किया जा रहा है विवश,
भक्ति में अब बिक रहा है धन।

शिक्षा बना हुआ है व्यापार,
बाल विवाह, सती, जाति-भेद, कुप्रथा—
कब होगा इस देश से बाहर?
आम आदमी कब उठाएगा अपनी आवाज़,
जब हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार बनता जा रहा है रिवाज़?

शायद सच्चाई अपनाने से हम सब डरते हैं,
धर्म, जाति, गोत्र के पीछे आज भी लोग लड़ते हैं।
कैसे पूरा होगा “विकसित भारत” का सपना,
जब देश के लोग खुद नहीं चाहते बदलना?

क्या इसी लिए देखा था वह सपना,
स्वराज को अपना बनाने का?
जिन क्रांतिकारियों की गई जान,
हर वह इंसान जिसने खोया अपना बेटा, भाई, पति—
अपने देश का था जो जवान
उन लोगों के बलिदान को व्यर्थ न ठहराओ।

अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाओ,
सही-ग़लत का भेद लोगों को समझाओ,
हर कुप्रथा पर रोक लगाओ,
अब तो वतन के प्रति अपना योगदान जताओ।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 सप्ताह पहले

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