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गीतिका : धूप सा खिलना तिरा...

                
                                                         
                            धूप सा खिलना तिरा अच्छा लगा,
                                                                 
                            
ख्वाब में मिलना तिरा अच्छा लगा।

यहां हर-पहर आवारगी का दौर है,
चाँद पर रुकना तिरा अच्छा लगा।

जानता हूँ ज़िंदगी अज़ाब है मगर,
जीस्त से लड़ना तिरा अच्छा लगा।

किसने कब उंगली उठाई स्वयं पर,
स्वयं पर हँसना तिरा अच्छा लगा।

राह दिल की ‘तेज’ गो अति तंग है,
पर बारहा चलना तिरा अच्छा लगा

- तेजपाल सिंह 'तेज'

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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4 वर्ष पहले

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