अक्षर से साहित्य बना है
अक्षर से गाली बनती है
एक तीली से दिया जलाएं...
एक तीली से बस्ती जलती है
रुक सांस तो चलने की बारी
सांस चले, तो दुनियांदारी
नाच रहे, सब बारी बारी...
नचा रहा है, कोई मदारी
यहां सभी को आना पड़ता है
जिसका जो रह जाता बाकी
हिसाब कही बाहर होता है...
दुनियां तो है, बस एक झांकी
-पवन मिश्रा
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