हिमगिरि ने शंख बजाया,
तब स्वर्ग-नदी को आना था।
भगीरथ के अटल तप से,
फिर धरती का दुख मिटाना था।
सगर-सुतों की राख पुकारे,
अब उन्हें मुक्ति दिलवानी थी।
पीढ़ी-पीढ़ी आस अधूरी,
तब गंगा धरा पर लानी थी।
शिव ने उसका वेग सँभाला,
तब जग ने मुक्ति की राह पाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
यज्ञ-अश्व की खोज में निकले,
तब सगर-सुत भ्रम में आए थे।
कपिल मुनि को दोषी समझकर,
और अपने प्राण गँवाए थे।
राख बनी फिर मौन प्रतीक्षा,
अब कौन उन्हें तरवाएगा?
अंशुमान और दिलीप तपे पर,
फिर कौन गंगा उतरवाएगा?
पूर्वजों की पीड़ा ने ही,
भगीरथ में नव आस जगाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
राजमुकुट को त्याग भगीरथ,
तब निर्जन वन में तप करते थे।
शीत, तपन और वर्षा सहकर,
वे हर पल गंगा-नाम जपते थे।
उनकी कठिन तपस्या देखकर,
स्वयं पितामह आए थे।
“शिव को पहले प्रसन्न करो तुम,”
और यही उपाय बताए थे।
तप से फिर महादेव पिघले,
और शिव की जट में गंगा समाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
स्वर्ग छोड़कर गंगा उतरी,
तब वेग प्रचंड दिखाती थी।
शिव को भी संग बहा लेगी,
वह मन में गर्व सजाती थी।
महादेव ने जटा में बाँधा,
तब धारा वहीं थमाई थी।
भगीरथ ने विनती की तो,
फिर एक लट खोल बहाई थी।
पर्वत-पर्वत राह बनी फिर,
तब धरती ने खुशियाँ पाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
जाह्नु ऋषि के यज्ञ-स्थल पर,
तब तेज लहर चढ़ आई थी।
क्रोधित मुनि के तप-बल से वह,
उनके भीतर समाई थी।
भगीरथ की विनती सुनकर,
तब ऋषि ने उसे बहाया था।
“जाह्नवी” का पावन नाम,
फिर सारे जग ने अपनाया था।
सगर-सुतों की राख छुई तो,
तब उन सबने मुक्ति पाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
गोमुख के हिम-श्वेत हृदय से,
तब भागीरथी बहती आती है।
देवप्रयाग में अलकनंदा,
वहाँ उससे गले मिल जाती है।
ऋषिकेश की ध्यान-धरा को,
वह निर्मल नीर पिलाती है।
हरिद्वार से मैदानों में,
फिर नव हरियाली लाती है।
पर्वत से मैदानों तक वह,
और जीवन की सरगम लाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
हरिद्वार में कुंभ सजे तो,
तब आस्था-सागर लहराता है।
प्रयागराज के पुण्य-संगम पर,
वहाँ हर अंतर मिट जाता है।
काशी के घाटों की आरती,
जिसकी लौ गगन तक जाती है।
अंतिम यात्रा उसके तट पर,
वह मोक्ष की आस जगाती है।
संत, स्नान और सत्संगों ने,
मिलकर एकता की ज्योत जलाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
गाद बिछाकर खेत सँवारे,
वह मिट्टी में सोना उगाती है।
धान, गेहूँ, गन्ने की बाली,
फिर उसके जल से लहराती है।
नगर, ग्राम और तट की बस्ती,
उससे हरियाली पाती है।
सिंचाई से उद्योगों तक,
गंगा काम में आती है।
भारत की इस जीवन-रेखा ने,
तब जन-जन में आस जगाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
मछली, कछुए, गंगा-डॉल्फिन,
तब जल में गीत सुनाते हैं।
पक्षी, वन और तट के प्राणी,
फिर अपना घर बसाते हैं।
उसकी लहरें खेत और उपवन,
वह सबको नीर पिलाती है।
धरती के अनगिन जीवन को,
फिर अपनी गोद सुलाती है।
नदियों से ही सृष्टि बचेगी,
गंगा ने यह सीख सिखाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
माँ कहकर हम शीश झुकाते,
फिर भी जल मैला करते हैं।
फूल चढ़ाकर कचरा डालें,
और विष उसमें भरते हैं।
श्रद्धा केवल शब्द रहे तो,
तब पूजा कैसे फल पाएगी?
स्वच्छ नदी के बिना भला,
फिर पीढ़ी कैसे मुसकाएगी?
स्वच्छता जब धर्म बनेगी,
तभी वह सच्ची सेवा कहलाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
हिमनद पीछे हटते जाएँ,
अब सूख रही जलधारा है।
बदले मौसम, तपते तट ने,
मिलकर आज पुकारा है।
रेत खनन और गंदे नाले,
मिलकर उसका रूप बिगाड़ेंगे।
यदि अब भी हम मौन रहे तो,
फिर कैसे उसे सँवारेंगे?
जल, जंगल, मिट्टी की रक्षा को,
आज धरा ने टेर लगाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
एक भगीरथ तब था लेकिन,
अब हमें करोड़ों होने हैं।
सिर्फ स्नान से पुण्य न होगा,
अब दाग सभी को धोने हैं।
घर-घर जल की रीति बदलकर,
तब व्यर्थ बहाव बचाना है।
नदी, घाट और तट को निर्मल,
और माँ का ऋण चुकाना है।
हर हाथ नदी की रक्षा में उठे,
तभी नव पीढ़ी भगीरथ कहलाई।
शिव-जटा से निकली गंगा ने,
भक्ति-मुक्ति की राह दिखाई॥
— संतोष कुमार शर्मा
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