नसों, कोशिकाओं में हर लत उतार ली
ये ज़िन्दगी भली थी क्या हमने बिगाड़ दी
इक दीप जल रहा था, इक शमा थी रोशन
तस्वीर परवाने की खींची और मिटाल दी
बेवजह सवालात के देने पड़े जवाब
हमको नशों ने पी लिया हमने ख़ुदा सी की
तुम देर से समझे हो मेरी बात ऐ, सनम
हम देर तक कहते रहेंगे आज रात की
जो सुबह ख़्वाब है उसी के वास्ते इक शाम
आओ पिएं चलकर कहीं, वो डायरी रख ली
कुछ कह नहीं रहे अभी सुनते हैं हम मगर
या बात हो भली सी कुछ, या शायरी अच्छी
ये दौर 'रंग' और ही कुछ चाहे है तुमसे
ये ज़िन्दगी मगर जो इश्क़ को है सौंप दी
- मृदुल
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