23 मार्च को सिर्फ मालाएं चढ़ाना बंद करो,
अगर हिम्मत है तो सवाल उठाना शुरू करो!
क्योंकि
भगत सिंह ने किताबें नहीं, सोच बदली थी,
राजगुरु ने सिर्फ गोली नहीं, डर को मारा था,
सुखदेव ने खामोशी से भी
इंकलाब लिख डाला था!
और आज…
हम “लाइक” और “शेयर” में देशभक्ति ढूंढ रहे हैं,
सच बोलने से पहले
हज़ार बार डर रहे हैं!
अरे!
वो फांसी के तख्ते पर चढ़कर भी हंस दिए,
और हम कुर्सी के डर से झुक गए?
वो लड़ गए थे एक गुलामी से,
हम हार रहे हैं अपनी ही बनाई गुलामी से—
झूठ, डर, और समझौते की!
अगर सच में श्रद्धांजलि देनी है,
तो एक दिन के पोस्ट नहीं,
हर दिन के इंकलाब बनो!
जब अन्याय दिखे—चुप मत रहो,
जब सच दबे—तुम आवाज़ बनो,
जब डर लगे—याद करो,
वो हंसते हुए मौत से भी लड़ गए थे!
क्योंकि…
शहीदों की चिता पर सिर्फ मेले नहीं लगते,
वहाँ से क्रांति की आग उठती है—
जो सोए हुए समाज को जगाती है!
और सुन लो—
इंकलाब किताबों में नहीं,
तुम्हारे अंदर जिंदा होना चाहिए…
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