आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इंकलाब अभी बाकी है

                
                                                         
                            23 मार्च को सिर्फ मालाएं चढ़ाना बंद करो,
                                                                 
                            
अगर हिम्मत है तो सवाल उठाना शुरू करो!

क्योंकि
भगत सिंह ने किताबें नहीं, सोच बदली थी,
राजगुरु ने सिर्फ गोली नहीं, डर को मारा था,
सुखदेव ने खामोशी से भी
इंकलाब लिख डाला था!

और आज…
हम “लाइक” और “शेयर” में देशभक्ति ढूंढ रहे हैं,
सच बोलने से पहले
हज़ार बार डर रहे हैं!

अरे!
वो फांसी के तख्ते पर चढ़कर भी हंस दिए,
और हम कुर्सी के डर से झुक गए?

वो लड़ गए थे एक गुलामी से,
हम हार रहे हैं अपनी ही बनाई गुलामी से—
झूठ, डर, और समझौते की!

अगर सच में श्रद्धांजलि देनी है,
तो एक दिन के पोस्ट नहीं,
हर दिन के इंकलाब बनो!

जब अन्याय दिखे—चुप मत रहो,
जब सच दबे—तुम आवाज़ बनो,
जब डर लगे—याद करो,
वो हंसते हुए मौत से भी लड़ गए थे!

क्योंकि…
शहीदों की चिता पर सिर्फ मेले नहीं लगते,
वहाँ से क्रांति की आग उठती है—
जो सोए हुए समाज को जगाती है!

और सुन लो—
इंकलाब किताबों में नहीं,
तुम्हारे अंदर जिंदा होना चाहिए…
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर